नजीबाबादः 50 -60 के दशक की एक बेहद खूबसूरत अभिनेत्री निम्मी जो जुहू मुम्बई में बरसो से अकेली रहती थी 86 साल की उम्र में कुछ यादों के साथ ज़िन्दगी के बचे पलों को समेट हुए . 

     हम किसी कलाकार के मरने पर आंसू बहाते हैं, लेख लिखते हैं कुछ दिन उसके काम की बात करते हैं, तस्वीरें शेयर करते हैं. फिर ! सब भूल जाते हैं ! पर फिल्म मेरे महबूब मैं उन की अदाकारी और राजेन्द्र कुमार को उन के द्बारा कहा गया वो डॉयलॉग… मेरे मां जाये.. मेरे भाई.. सच शायद ही कोई भूल पाये 

  कुछ दिन पहले निम्मी जी का एक इंटरव्यू देखा था मैने News 18 उर्दू पर प्रसारित हुआ था यह इंटरव्यू और ये बात लगभग 4 महीने पुरानी है. इसमें एंकर की निम्मी जी के साथ गुफ़्तगू में निम्मी जी बहुत सी बातें याद नहीं कर पा रहीं थीं. अपनी फिल्मों, अपने रोल्स, साथी कलाकारों के बारे में बहुत सी यादों पर उम्र की बर्फ जम चुकी थी. एक कलाकार स्वयं के काम को भूलने लगे ! यह स्थिति मौत आने से पहले की आहट सी होती है. 

    मौत यकीन आनी है, सभी को आनी है. पर मरने से पहले ही पल पल मरना, एकाकी, निर्जीव जीवन ! एक वस्तु की तरह पड़ा हुआ इंसान. वो निम्मी जिसे कभी हॉलीवुड की फ़िल्म ऑफर हुई थी,लाखो लोग उन की अदाकारी और खूबसूरती पर मरते थे,मरने से कुछ महीनों पहले वो अदाकारा,वो स्टार इस स्थिति में थी कि यादाश्त ओर भूख, अकेला पन उन को तिल तिल कर मार रहा था. 

    इंटरव्यू ख़त्म होने के आखिरी पलों में एंकर जाने लगी. निम्मी जी बार बार उससे अनुरोध कर रहीं थीं फिर आना… ज़रूर आना… एक वेदना, किसी से चंद बातें करने को मचलता मन, एकाकी जीवन में किसी के आने का स्पंदन… इसे समझने के लिए उन  बुजुर्गों की पीड़ा चाहिए जो मरने से पहले मार दिए गए हैं. 

    18 फ़रवरी, 1933, आगरा, उत्तर प्रदेश मैं इन का जन्म हुआ था भारतीय हिन्दी फ़िल्मों की प्रसिद्ध अभिनेत्रियों में से एक रही हैं। उनका असली नाम ‘नवाब बानू’ था। बॉलीवुड की इस मासूम-सी ख़ूबसूरत अभिनेत्री को राज कपूर ने फ़िल्मी दुनिया से परिचय करवाया था। हालांकि निम्‍मी की फ़िल्मी शुरुआत सहायक अभिनेत्री के तौर पर राज कपूर और नर्गिस अभिनीत फ़िल्म ‘बरसात’ (1949) से हुई थी। दिलचस्‍प बात तो यह भी है कि इस ख़ूबसूरत अभिनेत्री पर राज कपूर की नज़र उस समय पड़ी, जब वे एक फ़िल्म की शूटिंग देख रही थीं। निम्मी अपनी समकालीन नायिकाओं मधुबाला, नर्गिस, नूतन, मीना कुमारी, सुरैया और गीता बाली के समान ही प्रतिभाशाली थीं। निम्मी ख़ूबसूरत आँखों वाली सम्मोहक अभिनेत्री मानी जाती हैं। फ़िल्म में उनकी भूमिका को कभी भी सहनायिका के रूप में नहीं लिया गया।

उन पर बहुत-सी फ़िल्मों के यादगार गीत फ़िल्माए गए थे। निर्देशक के. आसिफ़ की फ़िल्म ‘लव एंड गॉड’ उनकी आखिरी फ़िल्म थी। उनकी माँ का नाम वहीदन था, जो अपने दौर की मशहूर गायिका और अभिनेत्री थीं। निम्मी के पिता अब्दुल हकीम मिलिट्री में ठेकेदार थे। जब निम्मी केवल नौ वर्ष की थीं, तब इनकी माँ का स्वर्गवास का हो गया। उनके पिता ने निम्मी को ऐबटाबाद(पाकिस्तान) रहने के लिए दादी के पास भेज दिया। निम्मी के पिता स्वयं आगरा छोड़ कर मेरठ आ गये।

निम्मी उर्फ़ नवाब बानो अपने दौर की खुबसूरत अदाकारों में से एक रही हैं |

मुम्बई आगमन सन 1947 में भारत और पाकिस्तान के विभाजन के बाद शरणार्थियों की भीड़ में निम्मी और उनकी दादी भी थीं। निम्मी अपनी दादी के साथ बम्बई (वर्तमान मुम्बई) आ गयीं, जहाँ उनकी मौसी ज्योति रहती थीं, जो की हिन्दी फ़िल्मों में काम करती थीं। अब बम्बई निम्मी का नया आशियाना था, जहाँ एक रिफ्यूजी लड़की इतिहास के पन्नों में अपना नाम दर्ज करवाने के लिए तैयार थी।  निम्मी कभी स्कूल नहीं गई थीं। इसलिए घर की पढ़ाई ने उन्हें उर्दू तक ही सीमित रखा। वैसे फ़िल्मों में काम करते समय उन्होंने अंग्रेज़ी ज़रूर सीखी थी, लेकिन वे बातचीत अपनी ही जुबान में करती थीं। एक दिन काम करते वक्त निम्मी की मुलाकात लेखक अली रजा से हुई।

संवाद की रिहर्सल कराने के लिए अली रजा ने निम्मी की मदद की। बाद में अली रजा ने ही उनमें शायरी का शौक़ पैदा कर दिया। बाद में यह शायरी दोस्ती और प्यार में बदल गई तो निम्मी ने लेखक-पटकथाकार अली रजा से शादी कर ली लेकिन एक गलती के चलते उनका पूरा करियर बर्बाद हो गया। यह किस्सा 1963 की फिल्म ‘मेरे महबूब’ से जुड़ा हुआ है।

कहा जाता है कि इस फिल्म के लिए उन्होंने लीड रोल की बजाय सेकंड लीड रोल चुना था और उनका यही फैसला उनके करियर के लिए अभिशाप बन गया उन्होने फिल्म बरसात, दीदार, आन, उड़न खटोला और बसंत बहार जैसी कई जानी मानी फिल्मों से नाम कमाया । उन दिनों निम्मी मधुबाला के बीच काफी गहरी दोस्ती थी। यही वजह थी की निम्मी को मधुबाला अपने दिल की हर बात बताती थी। निम्मी को पता था कि मधुबाला दिलीप कुमार को किस हद तक चाहती थीं।

निम्मी ने एक इंटरव्यू में बताया, फिल्म अमर (1954) के सेट पर हम दोनों में गहरी दोस्ती हो गई थी। हमारे बीच दिलीप कुमार को लेकर भी चर्चाएं होने लगीं, जो उस फिल्म में मुख्य अभिनेता की भूमिका निभा रहे थे। दिलीप कुमार को अपना दिल दे चुकीं मधुबाला के दिमाग में निम्मी की बातों से थोड़ा शक पैदा हुआ। मधुबाला के मन में यह स्वभाविक सवाल उठा, ‘निम्मी दिलीप का उतना ही ख्याल क्यों रखती है, जितना मैं रखती हूं? अगर ऐसा है तो मुझे क्या करना चाहिए?’

एक दिन मधुबाला ने निम्मी से कहा, ‘निम्मी, क्या मैं तुमसे कुछ पूछ सकती हूं? मुझे विश्वास है कि तुम मुझसे झूठ नहीं बोलोगी और मुझसे कुछ नहीं छुपाओगी।’ जब निम्मी ने उन्हें आश्वस्त किया तो उन्होंने कहा कि अगर तुम दिलीप कुमार के बारे में वैसा ही महसूस करती हो जैसा मैं करती हूं तो मैं तुम्हारी खातिर उनकी जिंदगी से निकल जाऊंगी और मैं उन्हें तुम्हारे लिए दिलीप को छोड़ दूंगी।’ निम्मी को यह सुन कर गहरा धक्का लगा। फिर निम्मी ने खुद को संभालते हुए मधुबाला से दोस्ताना अंदाज में कहा कि ‘उन्हें दान में पति नहीं चाहिए।’

   इसके बाद फिल्म ‘अंदाज’ के सेट पर निम्मी की मुलाकात अभिनेता राजकपूर से हुई। राजकपूर उन दिनों अपनी फिल्म ‘बरसात’ के लिए किसी नए चेहरे की तलाश में थे और मुख्य अभिनेत्री के लिए नरगिस का चयन कर चुके थे। राजकपूर ने निम्मी की सुंदरता से प्रभावित होकर उनके सामने इस फिल्म में सहायक अभिनेत्री का प्रस्ताव रखा जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। 1949 में रिलीज हुई ‘बरसात’ से निम्मी ने फिल्म इंडस्ट्री में रातों रात अपनी पहचान बना लीं। निम्मी ने अपने चार दशक लंबे करियर में लगभग 50 फिल्मों में अभिनय किया है। इसके बाद निम्मी ने फिल्मी जगत से अलविदा कह दिया।

मौत शरीर का अंत है पर जो व्यक्ति अकेला छोड़ दिया गया है, किसी से बात करने को तरसता है, हर क्षण इस आस में गुज़ारता है की शायद उसे कोई याद कर कहीं से आ जाये ! पर कोई नहीं आता !

बहुत पहले से मर चुके उस व्यक्ति के पास आती है बस मृत्यु! काश हम मृत्यु से पहले हर एकाकी व्यक्ति को मरने से रोक पाएं!

अपने आस – पास के अकेले लोगों से बात करें. उनका शरीर मरने से पहले उन्हें ज़िंदा रखें. काश फ़िल्म जगत निम्मी जी को जीने की वजह दें पाता. काश ऐसे फिल्मी सितारे जो बॉलीवुड के आकाश पर आज अपनी रोशनी खो चुके बॉलीवुड परिवार इन्हें अपने परिवार का हिस्सा अपना परिवार समझे तो ये एंकर से फिर मिलने और अकेले पन मै अपनी बची ज़िन्दगी के पल ये गुमनामी और बेबसी के साथ ना जीये…निम्मी जी को अकेले पन और जीवन से तो छुटकारा मिल गया पर वो और उन की शानदार अदाकारी हमारे दिलो मैं कैद रहेगी.. 

लेखक – शादाब ज़फर शादाब